किसी के भी जाने के बाद उस इन्सान की अच्छाईयाँ ही याद रह जाती हैं। यह एक सच्चाई है जो इन्सान ही नही वस्तुओं पर भी लागू होती है।
अगर , आप अपनी साडी भी खो दे या किसी को दे दे , तो हर मौक़े पर ये लगेगा की "काश ! वोह वाली साडी होती तो इस मौक़े के लिए एकदम ठीक होती, मुझ पर फबती भी ख़ूब थी, वगैरह वगैरह ", फिर ये तो हमारे पापाजी थे, मेरे श्वसुर।
जिस तरह अचानक हाथ छूटा लिया , सोचती हूँ तो आज भी यकीन नहीं होता। जब भी याद करती हूँ -कर्नेल गंज वाले घर का निचला हिस्सा, बाथरूम के सामने , घर के मलिक का शव,एकदम ठण्डा। वोह छूवन, वोह अहसास याद है,पैर मानो लकड़ी हो गए थे। उन पलों को याद करती हूँ तो लगता है वो ठंडक की लहर मेरी रीढ़ की हड्डी से होती हुई पैरों तक चली गयी।
ये कौन सा तार था जो शोर्ट कर गया? पापाजी की 'वर्क शाप ', उसमे ना जाने क्या-क्या होता था। और वो सब कुछ ठीक कर लेते थे, टी.वी, रेडियो,ट्रांजिस्टर मिक्सी, घड़ी वगैरह ।
अक्सर ऐसा भी होता था --मानो गाडी नही चल रही है ।
मैं -"पापाजी, ये घड़ी नही चल रही है।"
पापाजी- "अच्छा, मेज़ पर रख दो।"
मैंने चुपचाप मेज़ पर रख दी--------------थोड़ी देर बाद ...
पापाजी-"घड़ी तो चल रही है भाई,"
मैं अपने बुद्धू पन को स्वीकारते हुये जाती और शरमाते हुये घड़ी ले आती। ऐसा दो-तीन बार हुआ। फिर मुझमे भी हिम्मत आ गयी। अगली बार -
मैं -"पापाजी ये घडी नही चल रही है, शायद आपकी मेज़ पर जा कर चलने लगे।"
कोई जवाब नही-----थोड़ी देर बाद ......
पापाजी-"अपनी घड़ी ले जाओ।"
ये तो घड़ियों का किस्सा था। मेरा दिल कर रह था की पापाजी के ठंढे शरीर को भी उसी मेज़ पर रख आऊँ और कह दू कि "चल नही रहा है" और पीछे से आवाज़ आ जाये "ले जाओ अपने पापाजी को " मगर ये डोर तो ऊपर वाले ने सिर्फ अपने पास संभाल कर रखी है।
पापाजी , जब नहा कर आते थे, तो पूजा कर के खाना खा कर एक घंटे के लिए सो जाते थे। अम्मा राह देखती रहती थी,कि कब वो नहाने जाये और कब खाना लगे। अक्सर ऐसा होता था कि ---, खाना मेज़ पर लग गया है, और पापाजी ग़ायब । मैं इस कमरे से उस कमरे ,आवाज़ दे रही हूँ , जब थक कर बैठ जाती तब नीचे से आवाज़ आती -"खोलो"। अम्मा कहती -"लेह ,बाहर चले गए थे ?"
पापाजी-"हाँ , वोह कर्नेल गंज चौराहे तक गया था, कुछ काम था।
हम दोनो ही खिझते थे मगर वो अपनी आदत से बेबस थे । कब ना उठ कर चल दें ,कोई कह नही सकता। ये आदत उन्होने आख़िरी दम तक नही छोडी । कब चल दिए पता ही नही चला।
पापाजी तो नही रहे, उनकी शिक्षा ,सिद्धान्त हमेशा हम लोगो के साथ रहेंगे --
-नेकी कर दरिया में डाल
-उतना ही करो जितना भूल सको
-दूसरों से उम्मीद मत करो
-व्यवहार बनाकर रक्खो
-ज़रूरत मन्द कि मदद करो
Friday, July 27, 2007
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