Friday, August 4, 2017

barish

ये बारिश का पानी
 एक एक बूँद को गुलिस्तां बनता ये पानी
कहीं  छप छप
कहीं थप थप
कहीं धड़ धड़ की धुन सुनाती ये बारिश
रात की रानी, हो  या बैगन
अमरुद हो या निम्बू
आम हो या जूही
 सभी को एक साथ गुसल कराती ये बारिश
घर से मज़ा ले तो
साढ़े तीन इंच  मुस्कराहट चिपकाती
सड़क पर भीग रहे हो
 तो आँखें मिचमिचाती ये बारिश
कैसा विलगाव सिखाती ये बारिश
स्याह बादल से छूट कर
पहाड़,बर्फ,नदी, नाले
मानव हो या पशु पक्षी
सबको एक सा मानती ये बारिश
बादलों का हाथ छूटते ही एक नयी दुनिया से मिल जाती 
डर तो ज़रूर लगा होगा,  छोडते समय
क्या होगा,कहाँ जाउंगी
बादलों के बिना की दुनिया ?????
क्या जाने हिम्मत की या परिस्थितियां थी
बस ये पता है
वो  न होता तो ये मंज़र न होता
ये दुनिया अनदेखी अनछुई रह जाती
कहाँ पता था पत्तों से मिलन का संगीत
मालूम नहीं था टीन की चादर पर गिरने का सुख
कैसे पाती  मखमली घास में खोने का अनुभव
जब तक थी, वो बादल का हिस्सा
डरी ,सहमी, क्लेश करती
 रोती धोती द्वेष करती
खुद को छोटा जान उधम मचाती
आज जाना ,मैं हूँ तो बादल हैं
और ये तो चक्र हैं ,आना है और फिर जाना हैं