पहाड़ का सूर्योदय भी निराला होता है ,सूरज तो बाद में दिखता है ,पहले कोई एक पहाडी का छोटा सा अंश चमक उठता है । ऐसा लगता है मानो किसी किशोरी ने अपने प्यार को देख भर लिया हो और उसी से उसकी आंखे चमक गयी हो। फिर धीरे-धीरे पहाडी पर धूप फिसलती जाती है,मानो उस षोडशी पर ढ़ेर सी मदिरा उड़ेल कर, उसका प्यार उसे चूमता जा रहा हो।सुबह की नाज़ुक हवा से हिलते हुये पेड़-पौधे ऐसे लग रहे हैं मानो नव-यौवना की एक-एक नस टूट रही हो,उसे लगता है अब वो अपने आप को संभाल नही पायेगी ,और बस पलों में ही उसका बाँध टूट जाएगा --तभी दूर से आती एक गाडी दिखती है ,कुछ पेड हिलते है ...बहुत गति है ,शुँ -शाँ इधर गयी और वो फिर उधर दिखायी दी ....फिर धीरे धीरे नीचे उतर गयी और फिर सब शांत।सूरज ने बड़ी सी चादर डाल कर अपनी प्रेयसी मसूरी को बाँहों में समेट कर छुपा लिया है। अब मसूरी अलग ही दिख रही है ,रौशनी में लिपटी। सूरज-मसूरी का अस्तित्त्व अलग-अलग नही रहा। मसूरी में दिन निकल आया और दिनचर्या शुरू हो गयी है।
अब धूप में गर्माइश आ गयी है ,हल्की-हल्की धूप की सेंक अच्छी लग रही थी तभी एक ठंडा सा झोंका आया और अन्दर तक सिहरन दे गया। लगता है सूरज और मसूरी की कुछ नोक- झोक चल रही है। कभी मसूरी की ठंड और कभी सूरज कि गरमी हावी हो जाती है।
एक होने के बाद जिन्दगी की प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं ,हर छोटी- छोटी बात पर बहस , बाकी किसी चीज़ के लिए वक़्त ही नही, बस भाग दौड़ में जिन्दगी कटने लगती है। कोई आये -कोई जाये जिन्दगी अपनी राह पर चलती रहती है। सुबह से शाम-शाम से सुबह, रात का अस्तित्त्व ही ख़त्म हो जाता है।
अब तो दिन भर ना जाने कितनी गाडियां आ रही हैं, जा रही रही हैं कोई फ़र्क ही नही पड़ता, इन्हें देख कर कोई विचार नही कौंधता।कभी लाइन की लाइन कारें, कभी बहुत देर तक कुछ नही,फिर एक पैदल ,फिर एक ट्रक ज़ोर से शोर मचाता हुआ,फिर कुछ स्कूल के बच्चे, फिर कुछ टूरिस्ट परिवार जिनमें आकर्षण का केंद्र है रेशमी थान में लिपटी मोंटी-मोंटी महिलाएं कभी-कभी तो लगता है, गोश्त की चलती फिरती दुकान है। बेचारी से अपना वज़न तो उठाया नही जाता तो अपना पर्स क्या उठायेगी। उनका पर्स उनकी बेटी ने उठा रक्खा है जो महज़ चार या पांच साल की होगी।
सूरज उसे कुछ भी कह देता है ,जितने भी नकारात्मक विशेषण हो सकते है वो मसूरी के लिए संभाल के रक्खे है, वो impulssive है, agressive है,उसकी बातें contradictory होती है , यानी की उसकी बातों पर विश्वास नही किया जा सकता। मसूरी का दिल चिरता है मगर कुछ बोल नही पाती, उसे लगता है तू-तू,मैं-मैं से रिश्ते खराब होते हैं। वो सूरज के बिना रह नही पायेगी ये एक सच है। एक बार ऐसा हुआ भी, कुछ दिनों तक सूरज दिखायी ही नही दिया, मसूरी तो मानो सूख ही गयी,उसका रुप- रंग भी उड़ गया। एकदम बदल गयी ,जैसे जीने के लिए कोई मकसद ही ना रहा हो, दुनिया से विश्वास उठ सा गया था। सारी भावनाएँ बहुत सतही और बेमानी सी हो गयी थी। अब आज कि ही बात लो -
आज भोर में थोड़ी बारिश हो गयी, जब सूरज आया तो मसूरी भीगी हूई थी। मसूरी ने बताया कि अभी बारिश हुई थी ,मगर सूरज कब मानने वाला , उसने कहा "बारिश? अभी तो नही हो रही, मैं तो उधर से ही आ रह हूँ, मुझे तो नही मिली, हा !हा !हा ! तुम्हारी भी स्टाइल है ,कुछ भी कह देती हो। मसूरी,क्या कहे ,कैसे प्रमाण दे ,और क्यों ? कब तक? वैसे तो सूरज बड़ा विशाल सा दिखता है,कभी उसे क्यों नही समझ पाता? उसे याद भी ख़ूब रहता है ,पूरा बही-खाता है। दिल का बही-खाता तो नही हो सकता। मसूरी अक्सर सोचती है कि अगर उसको चोट पहुंचती है तो सूरज को पता क्यों नही चलता, ऐसा कैसे हो सकता है ?वो ये मानने को कत्तई तैयार नही कि सूरज उसे प्यार नही करता। हाँ ये ज़रूर है कि ये बटा हुआ प्यार है,शायद इसीलिये संवेदनायें नही पहुँच नही पाती। आख़िर हर रात तो वो कहीँ और ही रहता है।
अब तक उसने मसूरी के लिए क्या- क्या किया है इसकी पूरी फेहरिस्त भी तैयार कर रखी है।
सूरज अपने जाने के वक़्त से पहले ख़ूब रंग बिखेरता है, खुद के लिए सोने सा पीला रंग संभाल रखा है, बाकी नारंगी,जामुनी, भूरा,हरा ये सारे रंग ऐसे बिखेर देता है कि बस देखते ही बनता है। मसूरी भी बहल जाती है, उसे लगता है कि सूरज उसी के लिए तो कर रहा है। सोचती है उसे कितना प्यार करता हैतब तक सूरज झट से डूब जाता है। उसका पीलापन अभी बरकरार है मानो जाते -जाते पलट कर देख रहा हो कि उसके जाते ही कोई दुसरा सूरज तो नही आ गया, शक्की कंही का!
मसूरी, दिल के हाथों मजबूर है , क्या करे ,वो ख़ूब अच्छी तरह समझती है कि सूरज उस पर शक करता है। कभी-कभी तो ग़ुस्से में सोचती भी है कि इस सूरज से अब कभी नही मिलूंगी। मगर रह भी तो नही पाती उसके बिना।