Friday, August 4, 2017

barish

ये बारिश का पानी
 एक एक बूँद को गुलिस्तां बनता ये पानी
कहीं  छप छप
कहीं थप थप
कहीं धड़ धड़ की धुन सुनाती ये बारिश
रात की रानी, हो  या बैगन
अमरुद हो या निम्बू
आम हो या जूही
 सभी को एक साथ गुसल कराती ये बारिश
घर से मज़ा ले तो
साढ़े तीन इंच  मुस्कराहट चिपकाती
सड़क पर भीग रहे हो
 तो आँखें मिचमिचाती ये बारिश
कैसा विलगाव सिखाती ये बारिश
स्याह बादल से छूट कर
पहाड़,बर्फ,नदी, नाले
मानव हो या पशु पक्षी
सबको एक सा मानती ये बारिश
बादलों का हाथ छूटते ही एक नयी दुनिया से मिल जाती 
डर तो ज़रूर लगा होगा,  छोडते समय
क्या होगा,कहाँ जाउंगी
बादलों के बिना की दुनिया ?????
क्या जाने हिम्मत की या परिस्थितियां थी
बस ये पता है
वो  न होता तो ये मंज़र न होता
ये दुनिया अनदेखी अनछुई रह जाती
कहाँ पता था पत्तों से मिलन का संगीत
मालूम नहीं था टीन की चादर पर गिरने का सुख
कैसे पाती  मखमली घास में खोने का अनुभव
जब तक थी, वो बादल का हिस्सा
डरी ,सहमी, क्लेश करती
 रोती धोती द्वेष करती
खुद को छोटा जान उधम मचाती
आज जाना ,मैं हूँ तो बादल हैं
और ये तो चक्र हैं ,आना है और फिर जाना हैं

Thursday, February 21, 2008

अपेक्षा और उपेक्षा

ऊफ! ये बारिश तो रुकने का नाम ही नही ले रही। शुचि के दिल कर रह था कि भाग कर अपनी किसी सहेली के घर चली जाये और चाय- पकौड़ी का आनंद ले। ले। दिल से मांगी गयी मुराद पूरी हो ही जाती है, सो बादल महाराज सांस लेने के लिए रुकना पड़ा और इधर शुचि गाडी ले कर रुक्मणी के घर पहुंच गयी। वहाँ जो रुक्मणी कि हालत देखी सो कुछ कहने का साहस ही नही हुआ. घर अस्त- व्यस्त, उसकी आंखे भी सूजी हुई थी , दिन के बारह बज चुके थे और अभी तक मैडम बिस्तर पर ही थी. शुचि मन ही मन सोचने लगी कि इतने नियम से रहने वाली, हर चीज़ करीने से रखने वाली को आख़िर हुआ क्या है? बड़ी हिम्मत करके शुचि ने पूछा," रुक्कू सब ठीक तो है ना?" रुक्मणी ने अश्रुपूरित नेत्रों से उसे देखा और बिना किसी संधर्भ के कहना शुरू किया -"आज ना जाने कितने दिन हो गए उन्होने फोन तक नही किया। किसी का भी फोन आता है तो लगता है कि उनका ही होगा ,मगर---.बिना saans लिए rukmani bolti ही गयीकभी -कभी तो लगता है, मैं ही उनके पीछे भाग रही हूँ, उन्हें मेरी ज़रूरत नही है, या वो आग बुझ गयी है जो कभी थी.आज तो कई बार ये भी सोचने लगी थी, कि मैं उन्हें प्यार करती क्यों हूँ, उनमे और मुझमे कुछ भी तो समान नही है । मैं भावुक कलात्मक,वो प्रैक्टिकल और दिमाग से लेने वाले। आज बार-बार आखें भर आ रही हैं ,सारे दर्द भरे गीत और गज़लें गाने का और सुनने का दिल कर रहा है। लगता है, बस जी भर कर रो लूँ । ये मेरी अपेक्षा ही तो है ,जो मुझे परेशान कर रही है या यूं कहें, कि वो मेरी उपेक्षा कर रहे हो और वो मुझे बर्दाश्त नही।मैं जानती हूँ , मैं खूबसूरत हूँ और ये भी कि, मुझसे ज़्यादा, उन्हें कोई नही प्यार कर सकता, उसके बावजूद, इतने दिनों से उन्होने मुझसे बात तक नही की ।शायद शुरू से ही , वो मुझे उतना प्यार नही करते थे जितना की मैं उन्हें ।मगर अब,अब मैं भी उन्हें भूलना चाहती हूँ .जानती हूँ,उनके बिना मेरी जिंदगी में रंग नही रहेंगे ,बियाबान सी हो जायेगी, फिर भी,इस उपेक्षा के अहसास से तो वो ही बेहतर है।ये भी समझती हूँ,कि जरूर उनकी कोई मज़बूरी होगी।मगर, ये मजबूरियाँ कुछ ज़्यादा जल्दी-जल्दी आने लगी हैं और मेरे-उनके बीच ही आती हैं, पता नही क्यों? जहाँ एक तरफ लगता है -रिश्ते ऊपर बनते हैं , वहीँ ये भी लगता है , रिश्ते गलत भी तो जुड़ सकते हैं । ये लुका-छिपी कब तक ?ये अपेक्षा-उपेक्षा कब तक? वो मेरे नही हो, तो ना सही -मैं तो तुम्हारी हूँ। नही,ये कहना आसान है करना नही,इसमे बहुत पीड़ा है। अब महसूस कर पाती हूँ --राधा के दिल पर क्या गुज़रती होगी, जब तमाम गोपिकाओं के साथ कृष्ण को लीला करते या नृत्य -गान करते करते हुये देखती होगी । अपेक्षा तो होती ही होगी कि " तुम सब को छोड़ कर सिर्फ मेरे पास आ जाओ", और दूसरों के पास देख कर उपेक्षा का अहसास भी होता होगा। कैसे सहा होगा भला राधा ने कृष्ण के इस रुप को? लगाव भी इतना कि पत्नी पीछे रह गयी, आज भी पूजा होती है तो "राधा-कृष्ण" की 'राधा' पहले 'कृष्ण' बाद में। कितनी शक्ति है समर्पण में, सहनशक्ति में ।मैं चाहती हूँ , मुझमे भी वैसा ही त्याग , समर्पण और बेइन्तहाँ प्यार आ जाये। आता तो है,मगर क्षणिक । ज़्यादातर समय मैं चाहती हूँ कि वो मेरे इर्द -गिर्द डोलते रहें और मैं इठलाती रहूँ, वो भवरे की तरह डोलते रहें और मैं तुम्हे हिश -हिश करके भागती रहूँ, अपेक्षा वो करें और उपेक्षा मैं ।कभी -कभी ऐसा भी लगता है कि वो सिर्फ अपनी ही कहते हैं और अपनी ही सुनते हैं । ना तो उन्होने कभी मेरी बात सुनी और ना ही कभी महसूस की, फिर भी ,बावली मैं ये ही मानती हूँ कि वो मुझे बेहद प्यार करते हैं । कहते हैं ना -" जगे को कोई क्या जगाये"। सब कुछ जानते बूझते भी अपने आप को धोखा देने कि ठान रक्खी है सो ठान रक्खी है। कोई भी अच्छी जगह देखती हूँ तो लगता है यहाँ मैं उनके साथ जरूर आऊंगी, और उनके पास मेरे लिए वक़्त ही नही है। है ना अजीब विडम्बना ? ऐसे में फिर से अपने-आप को झकझोरती हूँ और पूछती हूँ ,मैं उनसे क्यों प्यार करती हूँ ? आखिर, ऐसा है क्या उनमे ? पता है जवाब क्या मिलता है , "क्यूंकि मैं पागल हूँ"। फिर मैं खोज -खोज कर एक -एक चीज़ याद करती हूँ और एक-एक बात को याद करके अपने -आप को विश्वास दिलाती हूँ कि नही वो मुझे बेहद प्यार करते hain
क्या जिसमे बेचैनी ना हो । बुझा हुआ अलाव कैसा ?प्यार के ठहराव जैसा ! ये बारिश है ? या इश्क के बाद का अहसास !जो आस्मां रोता है।

Tuesday, August 14, 2007

अहसास

बचपन में स्कूल की किताब में एक कहानी पढी थी- एक राजकुमारी जो वर्षों तक सोती रही थी फिर एक राजकुमार आया और उसने राजकुमारी के माथे पर हाथ रक्खा और वो जाग गयी। अहिल्या अभिशप्त हो कर वर्षों तक प्रस्तर मूर्ति बनी रही , जब श्री राम आये तब उनका उद्धार हुआ। ये बातें अब समझ में आती है कि ये एक ऐसा एहसास है जो किसी एक के छूने से होता है। कोई एक ही हो सकता है जो शिलाखंड को मोम बना दे या वर्षों के सोये स्नायु-मंडल को जागृत कर दे। जब उनसे मिली तब ही ना जाने क्यों मैं उनकी तरफ खिची चली गयी ये शारीरिक आकर्षण था या पूर्व जन्म का रिश्ता, पता नही। ऐसा लगता था कि किसी सागर में फंस गयी हूँ ,जितना ही निकलने कि कोशिश करती थी उतना ही लहरें मुझे गहरायी कि तरफ खीचती जाती थी। सच कहूँ, तो बहने में मुझे भी आनंद आ रह था। कभी-कभी जब अंतरात्मा कि आवाज़ उभर जाती थी तो हाथ पांव मारती थी मगर वो भी बस घड़ी दो घड़ी फिर वापस उसी में रम जाती थी।
ये सिलसिला सालों साल चला । सोच कर भी आश्चर्य होता है कि कोई भला इतने दिनों तक कैसे , एक ही तरह react कर सकता है। उनसे मिलने के नाम से वैसे ही धड़कन का बढना मिलने पर guilt conscience का हावी होना मगर मिलने का कोई भी मौका मैं चूकती नही थी। सागर की लहरों के साथ बहना मुझे अच्छा लगता था। कई बार ज्वार-भाटे भी आये , मगर वो भी आ कर चले गए।
हर बार सागर मचलता हुआ आता और ढेर सी रेत को अपनी आगोश खींच कर ले जाता। धीरे - धीरे दोनो की आदत सी हो गयी और उफान ठण्डा पड़ने लगा । मैं चाहती थी ये ज्वार-भाटे रोज़ आयें और कुछ नही तो जब मेरी आवाज़ सुने तब ही सही, कम से कम बेचैनी का अहसास तो हो। मुझे ये शांति ये ठहराव अच्छा नही लग रहा था

इस बीच मेरा स्वास्थ्य भी ठीक नही था। सभी जानने वाले दिन में दो-तीन बार फोन कर लेते थे या किसी ना किसी तरह अहसास दिलाते थे की वो मेरे साथ हैं । मगर,साथ तो मुझे उनका चाहिऐ और वो बहुत व्यस्त रहते हैं

उन्हें तो अगर छींक भी आ जाये तो मुझसे दूर हो जायेंगे , यही नही, घर मे किसी की भी तबियत खराब हो टाइम् मेरा ही कटेगा। उनके घर कोई भी आ जाये-उनके साडू, साले या साले के ससुर के समधी के सगे चाचा के लड़के ,तो भी उन्हें अगर फुर्सत नही होगी तो सिर्फ मेरे लिए कोई भी बात हो बड़ी या छोटी टाइम् -कट इधर ही होगा। खैर,ये सब तो मुझे लगता है, उनके पास भी ज़रूर अपने कारण होंगे।

मेरी बीमारी के दौरान उन्होने मुझे योग भी सिखाया और आत्म उत्थान की बातें भी किया करते थे। हाँ ! वो जो भी कहते थे में करती ज़रूर थी। धीरे-धीरे हम सिर्फ फलसफों पर या "सब ठीक- हाँ सब ठीक" पर आ गए। वो प्यार वो खिचाव तो कहीँ खो गया।

मैंने कहा-आप मेरे स्प्रीचुअल गुरू हो गए, मगर इस प्रक्रिया में मैने अपना प्यार कहीँ खो दिया। वो कहते-कृष्णा के ८४ रुप ऐसे ही थे,तब मैने सोचा कि आप कृष्ण कि नक़ल ही कर रहे हो तो क्यों ना मैं असली कृष्णा कि राधा बन जाऊं । नक़ल नही , असल चाहिऐ। दिल के प्यार को, उसके खिचाव को सागर और चांद ही समझ सकते हैं। उसमे मिटने का मज़ा रेत ही बता सकती है। ये किसी कि नक़ल से नही होता। हर प्यार कि अपनी भाषा होती है , अपनी दिशा, अपनी मंजिल। ये किसी और के दिखाए रास्ते पर नही चल सकता। इतना सोचा-समझा हुआ संभल -संभल कर चलने वाला प्यार होता ही नही।
आप आत्मिक गुरू ही ठीक हैं प्यार आपके बस की बात नही। इसमे मुझे मोल भाव भी नही करना मुझे जो जैसा चाहिऐ ,वो है तो दो , वरना मैं चली असली वाले कृष्णा के पास। गीता ही पडी है तो उन्ही से पढ़ लूंगी आपको क्यों परेशान करूं ?

Friday, July 27, 2007

श्रद्धांजलि

किसी के भी जाने के बाद उस इन्सान की अच्छाईयाँ ही याद रह जाती हैं। यह एक सच्चाई है जो इन्सान ही नही वस्तुओं पर भी लागू होती है।
अगर , आप अपनी साडी भी खो दे या किसी को दे दे , तो हर मौक़े पर ये लगेगा की "काश ! वोह वाली साडी होती तो इस मौक़े के लिए एकदम ठीक होती, मुझ पर फबती भी ख़ूब थी, वगैरह वगैरह ", फिर ये तो हमारे पापाजी थे, मेरे श्वसुर।
जिस तरह अचानक हाथ छूटा लिया , सोचती हूँ तो आज भी यकीन नहीं होता। जब भी याद करती हूँ -कर्नेल गंज वाले घर का निचला हिस्सा, बाथरूम के सामने , घर के मलिक का शव,एकदम ठण्डा। वोह छूवन, वोह अहसास याद है,पैर मानो लकड़ी हो गए थे। उन पलों को याद करती हूँ तो लगता है वो ठंडक की लहर मेरी रीढ़ की हड्डी से होती हुई पैरों तक चली गयी।
ये कौन सा तार था जो शोर्ट कर गया? पापाजी की 'वर्क शाप ', उसमे ना जाने क्या-क्या होता था। और वो सब कुछ ठीक कर लेते थे, टी.वी, रेडियो,ट्रांजिस्टर मिक्सी, घड़ी वगैरह ।
अक्सर ऐसा भी होता था --मानो गाडी नही चल रही है ।
मैं -"पापाजी, ये घड़ी नही चल रही है।"
पापाजी- "अच्छा, मेज़ पर रख दो।"
मैंने चुपचाप मेज़ पर रख दी--------------थोड़ी देर बाद ...
पापाजी-"घड़ी तो चल रही है भाई,"
मैं अपने बुद्धू पन को स्वीकारते हुये जाती और शरमाते हुये घड़ी ले आती। ऐसा दो-तीन बार हुआ। फिर मुझमे भी हिम्मत आ गयी। अगली बार -
मैं -"पापाजी ये घडी नही चल रही है, शायद आपकी मेज़ पर जा कर चलने लगे।"
कोई जवाब नही-----थोड़ी देर बाद ......
पापाजी-"अपनी घड़ी ले जाओ।"
ये तो घड़ियों का किस्सा था। मेरा दिल कर रह था की पापाजी के ठंढे शरीर को भी उसी मेज़ पर रख आऊँ और कह दू कि "चल नही रहा है" और पीछे से आवाज़ आ जाये "ले जाओ अपने पापाजी को " मगर ये डोर तो ऊपर वाले ने सिर्फ अपने पास संभाल कर रखी है।
पापाजी , जब नहा कर आते थे, तो पूजा कर के खाना खा कर एक घंटे के लिए सो जाते थे। अम्मा राह देखती रहती थी,कि कब वो नहाने जाये और कब खाना लगे। अक्सर ऐसा होता था कि ---, खाना मेज़ पर लग गया है, और पापाजी ग़ायब । मैं इस कमरे से उस कमरे ,आवाज़ दे रही हूँ , जब थक कर बैठ जाती तब नीचे से आवाज़ आती -"खोलो"। अम्मा कहती -"लेह ,बाहर चले गए थे ?"
पापाजी-"हाँ , वोह कर्नेल गंज चौराहे तक गया था, कुछ काम था।
हम दोनो ही खिझते थे मगर वो अपनी आदत से बेबस थे । कब ना उठ कर चल दें ,कोई कह नही सकता। ये आदत उन्होने आख़िरी दम तक नही छोडी । कब चल दिए पता ही नही चला।
पापाजी तो नही रहे, उनकी शिक्षा ,सिद्धान्त हमेशा हम लोगो के साथ रहेंगे --
-नेकी कर दरिया में डाल
-उतना ही करो जितना भूल सको
-दूसरों से उम्मीद मत करो
-व्यवहार बनाकर रक्खो
-ज़रूरत मन्द कि मदद करो

Wednesday, May 2, 2007

यादें

याद आती है वो घुमावदार सीढी,
वो नीम का पेड़,
और वो छत ,
छत पर खटिया डाले देर तक बतियाना ।

लगता था तब ,
यूं ही रहेगा सब,
हमेशा,
सारी जिंदगी!

याद आता है वो दिन ,
तुमने मेरे गणित के टीचर को
धमाकाया था.
कहा- बता तेरा पढाया ,
मेरी बहना को समझ क्यों नही आता है ?
अब से ठीक से पढ़ाना,
नही तो ,स्कूल मत आना

फिर पता नही कब हम बडे हो गए ,
ब्याहे गए
बडे अरमानों से इस पीढी की पहली बहू आयी
फिर पता नही क्यों ?
तुम दूर से दूर होते गए
हमने बहुत गोते लगाए
मगर रोते आये ।

ऐसा लगा तुम हम सब से नाराज़ हो
बात क्या है
पता नही !
बस, तुम भागते गए
और हम मुहँ खोलें ताकते गए ।

आज आंखे नम हैं
याद नही तुम खुश हो कर कैसे लगते थे
दिखते हो तुम मुझे बहुत दयनीय शकल में
लुंगी और बनियान में
नाक सुड़क सुड़क कर आंसू बहाते
और अपने ही हाथों से पोछ्ते ।

याद आती है वो सीढी ,वो पेड़ ,वो छत।

रिश्ते

माँ की धड़कन ,बाप का सपना !
छह चाचाओं के बीच था सोता ,
बाबा जी का पहला पोता ,
दादी की आँखों का तारा ,
बहनो से भी दुःख -सुख बाटें थे ।

आज अकेला जूझ रहा है ,
कहते है ..
कर्मों के फल झेल रहा है ,
कतरातें हैं अपना कहने से !

सारे धागे टूट गए ,
सारे बन्धन खो गए ,
हम कितने स्वार्थी हो गए !

कल अपना कहते थकते ना थे,
आज डरते हैं कोई जान ना ले ,
........कि 'अपना' है
क्या ऐसे दिन भी होते हैं,
और ऐसी काली रात!

Monday, April 23, 2007

मसूरी और सूरज

पहाड़ का सूर्योदय भी निराला होता है ,सूरज तो बाद में दिखता है ,पहले कोई एक पहाडी का छोटा सा अंश चमक उठता है । ऐसा लगता है मानो किसी किशोरी ने अपने प्यार को देख भर लिया हो और उसी से उसकी आंखे चमक गयी हो। फिर धीरे-धीरे पहाडी पर धूप फिसलती जाती है,मानो उस षोडशी पर ढ़ेर सी मदिरा उड़ेल कर, उसका प्यार उसे चूमता जा रहा हो।सुबह की नाज़ुक हवा से हिलते हुये पेड़-पौधे ऐसे लग रहे हैं मानो नव-यौवना की एक-एक नस टूट रही हो,उसे लगता है अब वो अपने आप को संभाल नही पायेगी ,और बस पलों में ही उसका बाँध टूट जाएगा --तभी दूर से आती एक गाडी दिखती है ,कुछ पेड हिलते है ...बहुत गति है ,शुँ -शाँ इधर गयी और वो फिर उधर दिखायी दी ....फिर धीरे धीरे नीचे उतर गयी और फिर सब शांत।सूरज ने बड़ी सी चादर डाल कर अपनी प्रेयसी मसूरी को बाँहों में समेट कर छुपा लिया है। अब मसूरी अलग ही दिख रही है ,रौशनी में लिपटी। सूरज-मसूरी का अस्तित्त्व अलग-अलग नही रहा। मसूरी में दिन निकल आया और दिनचर्या शुरू हो गयी है।
अब धूप में गर्माइश आ गयी है ,हल्की-हल्की धूप की सेंक अच्छी लग रही थी तभी एक ठंडा सा झोंका आया और अन्दर तक सिहरन दे गया। लगता है सूरज और मसूरी की कुछ नोक- झोक चल रही है। कभी मसूरी की ठंड और कभी सूरज कि गरमी हावी हो जाती है।
एक होने के बाद जिन्दगी की प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं ,हर छोटी- छोटी बात पर बहस , बाकी किसी चीज़ के लिए वक़्त ही नही, बस भाग दौड़ में जिन्दगी कटने लगती है। कोई आये -कोई जाये जिन्दगी अपनी राह पर चलती रहती है। सुबह से शाम-शाम से सुबह, रात का अस्तित्त्व ही ख़त्म हो जाता है।
अब तो दिन भर ना जाने कितनी गाडियां आ रही हैं, जा रही रही हैं कोई फ़र्क ही नही पड़ता, इन्हें देख कर कोई विचार नही कौंधता।कभी लाइन की लाइन कारें, कभी बहुत देर तक कुछ नही,फिर एक पैदल ,फिर एक ट्रक ज़ोर से शोर मचाता हुआ,फिर कुछ स्कूल के बच्चे, फिर कुछ टूरिस्ट परिवार जिनमें आकर्षण का केंद्र है रेशमी थान में लिपटी मोंटी-मोंटी महिलाएं कभी-कभी तो लगता है, गोश्त की चलती फिरती दुकान है। बेचारी से अपना वज़न तो उठाया नही जाता तो अपना पर्स क्या उठायेगी। उनका पर्स उनकी बेटी ने उठा रक्खा है जो महज़ चार या पांच साल की होगी।
सूरज उसे कुछ भी कह देता है ,जितने भी नकारात्मक विशेषण हो सकते है वो मसूरी के लिए संभाल के रक्खे है, वो impulssive है, agressive है,उसकी बातें contradictory होती है , यानी की उसकी बातों पर विश्वास नही किया जा सकता। मसूरी का दिल चिरता है मगर कुछ बोल नही पाती, उसे लगता है तू-तू,मैं-मैं से रिश्ते खराब होते हैं। वो सूरज के बिना रह नही पायेगी ये एक सच है। एक बार ऐसा हुआ भी, कुछ दिनों तक सूरज दिखायी ही नही दिया, मसूरी तो मानो सूख ही गयी,उसका रुप- रंग भी उड़ गया। एकदम बदल गयी ,जैसे जीने के लिए कोई मकसद ही ना रहा हो, दुनिया से विश्वास उठ सा गया था। सारी भावनाएँ बहुत सतही और बेमानी सी हो गयी थी। अब आज कि ही बात लो -
आज भोर में थोड़ी बारिश हो गयी, जब सूरज आया तो मसूरी भीगी हूई थी। मसूरी ने बताया कि अभी बारिश हुई थी ,मगर सूरज कब मानने वाला , उसने कहा "बारिश? अभी तो नही हो रही, मैं तो उधर से ही आ रह हूँ, मुझे तो नही मिली, हा !हा !हा ! तुम्हारी भी स्टाइल है ,कुछ भी कह देती हो। मसूरी,क्या कहे ,कैसे प्रमाण दे ,और क्यों ? कब तक? वैसे तो सूरज बड़ा विशाल सा दिखता है,कभी उसे क्यों नही समझ पाता? उसे याद भी ख़ूब रहता है ,पूरा बही-खाता है। दिल का बही-खाता तो नही हो सकता। मसूरी अक्सर सोचती है कि अगर उसको चोट पहुंचती है तो सूरज को पता क्यों नही चलता, ऐसा कैसे हो सकता है ?वो ये मानने को कत्तई तैयार नही कि सूरज उसे प्यार नही करता। हाँ ये ज़रूर है कि ये बटा हुआ प्यार है,शायद इसीलिये संवेदनायें नही पहुँच नही पाती। आख़िर हर रात तो वो कहीँ और ही रहता है।
अब तक उसने मसूरी के लिए क्या- क्या किया है इसकी पूरी फेहरिस्त भी तैयार कर रखी है।
सूरज अपने जाने के वक़्त से पहले ख़ूब रंग बिखेरता है, खुद के लिए सोने सा पीला रंग संभाल रखा है, बाकी नारंगी,जामुनी, भूरा,हरा ये सारे रंग ऐसे बिखेर देता है कि बस देखते ही बनता है। मसूरी भी बहल जाती है, उसे लगता है कि सूरज उसी के लिए तो कर रहा है। सोचती है उसे कितना प्यार करता हैतब तक सूरज झट से डूब जाता है। उसका पीलापन अभी बरकरार है मानो जाते -जाते पलट कर देख रहा हो कि उसके जाते ही कोई दुसरा सूरज तो नही आ गया, शक्की कंही का!
मसूरी, दिल के हाथों मजबूर है , क्या करे ,वो ख़ूब अच्छी तरह समझती है कि सूरज उस पर शक करता है। कभी-कभी तो ग़ुस्से में सोचती भी है कि इस सूरज से अब कभी नही मिलूंगी। मगर रह भी तो नही पाती उसके बिना।