बचपन में स्कूल की किताब में एक कहानी पढी थी- एक राजकुमारी जो वर्षों तक सोती रही थी फिर एक राजकुमार आया और उसने राजकुमारी के माथे पर हाथ रक्खा और वो जाग गयी। अहिल्या अभिशप्त हो कर वर्षों तक प्रस्तर मूर्ति बनी रही , जब श्री राम आये तब उनका उद्धार हुआ। ये बातें अब समझ में आती है कि ये एक ऐसा एहसास है जो किसी एक के छूने से होता है। कोई एक ही हो सकता है जो शिलाखंड को मोम बना दे या वर्षों के सोये स्नायु-मंडल को जागृत कर दे। जब उनसे मिली तब ही ना जाने क्यों मैं उनकी तरफ खिची चली गयी ये शारीरिक आकर्षण था या पूर्व जन्म का रिश्ता, पता नही। ऐसा लगता था कि किसी सागर में फंस गयी हूँ ,जितना ही निकलने कि कोशिश करती थी उतना ही लहरें मुझे गहरायी कि तरफ खीचती जाती थी। सच कहूँ, तो बहने में मुझे भी आनंद आ रह था। कभी-कभी जब अंतरात्मा कि आवाज़ उभर जाती थी तो हाथ पांव मारती थी मगर वो भी बस घड़ी दो घड़ी फिर वापस उसी में रम जाती थी।
ये सिलसिला सालों साल चला । सोच कर भी आश्चर्य होता है कि कोई भला इतने दिनों तक कैसे , एक ही तरह react कर सकता है। उनसे मिलने के नाम से वैसे ही धड़कन का बढना मिलने पर guilt conscience का हावी होना मगर मिलने का कोई भी मौका मैं चूकती नही थी। सागर की लहरों के साथ बहना मुझे अच्छा लगता था। कई बार ज्वार-भाटे भी आये , मगर वो भी आ कर चले गए।
हर बार सागर मचलता हुआ आता और ढेर सी रेत को अपनी आगोश खींच कर ले जाता। धीरे - धीरे दोनो की आदत सी हो गयी और उफान ठण्डा पड़ने लगा । मैं चाहती थी ये ज्वार-भाटे रोज़ आयें और कुछ नही तो जब मेरी आवाज़ सुने तब ही सही, कम से कम बेचैनी का अहसास तो हो। मुझे ये शांति ये ठहराव अच्छा नही लग रहा था
इस बीच मेरा स्वास्थ्य भी ठीक नही था। सभी जानने वाले दिन में दो-तीन बार फोन कर लेते थे या किसी ना किसी तरह अहसास दिलाते थे की वो मेरे साथ हैं । मगर,साथ तो मुझे उनका चाहिऐ और वो बहुत व्यस्त रहते हैं
उन्हें तो अगर छींक भी आ जाये तो मुझसे दूर हो जायेंगे , यही नही, घर मे किसी की भी तबियत खराब हो टाइम् मेरा ही कटेगा। उनके घर कोई भी आ जाये-उनके साडू, साले या साले के ससुर के समधी के सगे चाचा के लड़के ,तो भी उन्हें अगर फुर्सत नही होगी तो सिर्फ मेरे लिए कोई भी बात हो बड़ी या छोटी टाइम् -कट इधर ही होगा। खैर,ये सब तो मुझे लगता है, उनके पास भी ज़रूर अपने कारण होंगे।
मेरी बीमारी के दौरान उन्होने मुझे योग भी सिखाया और आत्म उत्थान की बातें भी किया करते थे। हाँ ! वो जो भी कहते थे में करती ज़रूर थी। धीरे-धीरे हम सिर्फ फलसफों पर या "सब ठीक- हाँ सब ठीक" पर आ गए। वो प्यार वो खिचाव तो कहीँ खो गया।
मैंने कहा-आप मेरे स्प्रीचुअल गुरू हो गए, मगर इस प्रक्रिया में मैने अपना प्यार कहीँ खो दिया। वो कहते-कृष्णा के ८४ रुप ऐसे ही थे,तब मैने सोचा कि आप कृष्ण कि नक़ल ही कर रहे हो तो क्यों ना मैं असली कृष्णा कि राधा बन जाऊं । नक़ल नही , असल चाहिऐ। दिल के प्यार को, उसके खिचाव को सागर और चांद ही समझ सकते हैं। उसमे मिटने का मज़ा रेत ही बता सकती है। ये किसी कि नक़ल से नही होता। हर प्यार कि अपनी भाषा होती है , अपनी दिशा, अपनी मंजिल। ये किसी और के दिखाए रास्ते पर नही चल सकता। इतना सोचा-समझा हुआ संभल -संभल कर चलने वाला प्यार होता ही नही।
आप आत्मिक गुरू ही ठीक हैं प्यार आपके बस की बात नही। इसमे मुझे मोल भाव भी नही करना मुझे जो जैसा चाहिऐ ,वो है तो दो , वरना मैं चली असली वाले कृष्णा के पास। गीता ही पडी है तो उन्ही से पढ़ लूंगी आपको क्यों परेशान करूं ?
Tuesday, August 14, 2007
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