Wednesday, May 2, 2007

यादें

याद आती है वो घुमावदार सीढी,
वो नीम का पेड़,
और वो छत ,
छत पर खटिया डाले देर तक बतियाना ।

लगता था तब ,
यूं ही रहेगा सब,
हमेशा,
सारी जिंदगी!

याद आता है वो दिन ,
तुमने मेरे गणित के टीचर को
धमाकाया था.
कहा- बता तेरा पढाया ,
मेरी बहना को समझ क्यों नही आता है ?
अब से ठीक से पढ़ाना,
नही तो ,स्कूल मत आना

फिर पता नही कब हम बडे हो गए ,
ब्याहे गए
बडे अरमानों से इस पीढी की पहली बहू आयी
फिर पता नही क्यों ?
तुम दूर से दूर होते गए
हमने बहुत गोते लगाए
मगर रोते आये ।

ऐसा लगा तुम हम सब से नाराज़ हो
बात क्या है
पता नही !
बस, तुम भागते गए
और हम मुहँ खोलें ताकते गए ।

आज आंखे नम हैं
याद नही तुम खुश हो कर कैसे लगते थे
दिखते हो तुम मुझे बहुत दयनीय शकल में
लुंगी और बनियान में
नाक सुड़क सुड़क कर आंसू बहाते
और अपने ही हाथों से पोछ्ते ।

याद आती है वो सीढी ,वो पेड़ ,वो छत।

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