Thursday, February 21, 2008

अपेक्षा और उपेक्षा

ऊफ! ये बारिश तो रुकने का नाम ही नही ले रही। शुचि के दिल कर रह था कि भाग कर अपनी किसी सहेली के घर चली जाये और चाय- पकौड़ी का आनंद ले। ले। दिल से मांगी गयी मुराद पूरी हो ही जाती है, सो बादल महाराज सांस लेने के लिए रुकना पड़ा और इधर शुचि गाडी ले कर रुक्मणी के घर पहुंच गयी। वहाँ जो रुक्मणी कि हालत देखी सो कुछ कहने का साहस ही नही हुआ. घर अस्त- व्यस्त, उसकी आंखे भी सूजी हुई थी , दिन के बारह बज चुके थे और अभी तक मैडम बिस्तर पर ही थी. शुचि मन ही मन सोचने लगी कि इतने नियम से रहने वाली, हर चीज़ करीने से रखने वाली को आख़िर हुआ क्या है? बड़ी हिम्मत करके शुचि ने पूछा," रुक्कू सब ठीक तो है ना?" रुक्मणी ने अश्रुपूरित नेत्रों से उसे देखा और बिना किसी संधर्भ के कहना शुरू किया -"आज ना जाने कितने दिन हो गए उन्होने फोन तक नही किया। किसी का भी फोन आता है तो लगता है कि उनका ही होगा ,मगर---.बिना saans लिए rukmani bolti ही गयीकभी -कभी तो लगता है, मैं ही उनके पीछे भाग रही हूँ, उन्हें मेरी ज़रूरत नही है, या वो आग बुझ गयी है जो कभी थी.आज तो कई बार ये भी सोचने लगी थी, कि मैं उन्हें प्यार करती क्यों हूँ, उनमे और मुझमे कुछ भी तो समान नही है । मैं भावुक कलात्मक,वो प्रैक्टिकल और दिमाग से लेने वाले। आज बार-बार आखें भर आ रही हैं ,सारे दर्द भरे गीत और गज़लें गाने का और सुनने का दिल कर रहा है। लगता है, बस जी भर कर रो लूँ । ये मेरी अपेक्षा ही तो है ,जो मुझे परेशान कर रही है या यूं कहें, कि वो मेरी उपेक्षा कर रहे हो और वो मुझे बर्दाश्त नही।मैं जानती हूँ , मैं खूबसूरत हूँ और ये भी कि, मुझसे ज़्यादा, उन्हें कोई नही प्यार कर सकता, उसके बावजूद, इतने दिनों से उन्होने मुझसे बात तक नही की ।शायद शुरू से ही , वो मुझे उतना प्यार नही करते थे जितना की मैं उन्हें ।मगर अब,अब मैं भी उन्हें भूलना चाहती हूँ .जानती हूँ,उनके बिना मेरी जिंदगी में रंग नही रहेंगे ,बियाबान सी हो जायेगी, फिर भी,इस उपेक्षा के अहसास से तो वो ही बेहतर है।ये भी समझती हूँ,कि जरूर उनकी कोई मज़बूरी होगी।मगर, ये मजबूरियाँ कुछ ज़्यादा जल्दी-जल्दी आने लगी हैं और मेरे-उनके बीच ही आती हैं, पता नही क्यों? जहाँ एक तरफ लगता है -रिश्ते ऊपर बनते हैं , वहीँ ये भी लगता है , रिश्ते गलत भी तो जुड़ सकते हैं । ये लुका-छिपी कब तक ?ये अपेक्षा-उपेक्षा कब तक? वो मेरे नही हो, तो ना सही -मैं तो तुम्हारी हूँ। नही,ये कहना आसान है करना नही,इसमे बहुत पीड़ा है। अब महसूस कर पाती हूँ --राधा के दिल पर क्या गुज़रती होगी, जब तमाम गोपिकाओं के साथ कृष्ण को लीला करते या नृत्य -गान करते करते हुये देखती होगी । अपेक्षा तो होती ही होगी कि " तुम सब को छोड़ कर सिर्फ मेरे पास आ जाओ", और दूसरों के पास देख कर उपेक्षा का अहसास भी होता होगा। कैसे सहा होगा भला राधा ने कृष्ण के इस रुप को? लगाव भी इतना कि पत्नी पीछे रह गयी, आज भी पूजा होती है तो "राधा-कृष्ण" की 'राधा' पहले 'कृष्ण' बाद में। कितनी शक्ति है समर्पण में, सहनशक्ति में ।मैं चाहती हूँ , मुझमे भी वैसा ही त्याग , समर्पण और बेइन्तहाँ प्यार आ जाये। आता तो है,मगर क्षणिक । ज़्यादातर समय मैं चाहती हूँ कि वो मेरे इर्द -गिर्द डोलते रहें और मैं इठलाती रहूँ, वो भवरे की तरह डोलते रहें और मैं तुम्हे हिश -हिश करके भागती रहूँ, अपेक्षा वो करें और उपेक्षा मैं ।कभी -कभी ऐसा भी लगता है कि वो सिर्फ अपनी ही कहते हैं और अपनी ही सुनते हैं । ना तो उन्होने कभी मेरी बात सुनी और ना ही कभी महसूस की, फिर भी ,बावली मैं ये ही मानती हूँ कि वो मुझे बेहद प्यार करते हैं । कहते हैं ना -" जगे को कोई क्या जगाये"। सब कुछ जानते बूझते भी अपने आप को धोखा देने कि ठान रक्खी है सो ठान रक्खी है। कोई भी अच्छी जगह देखती हूँ तो लगता है यहाँ मैं उनके साथ जरूर आऊंगी, और उनके पास मेरे लिए वक़्त ही नही है। है ना अजीब विडम्बना ? ऐसे में फिर से अपने-आप को झकझोरती हूँ और पूछती हूँ ,मैं उनसे क्यों प्यार करती हूँ ? आखिर, ऐसा है क्या उनमे ? पता है जवाब क्या मिलता है , "क्यूंकि मैं पागल हूँ"। फिर मैं खोज -खोज कर एक -एक चीज़ याद करती हूँ और एक-एक बात को याद करके अपने -आप को विश्वास दिलाती हूँ कि नही वो मुझे बेहद प्यार करते hain
क्या जिसमे बेचैनी ना हो । बुझा हुआ अलाव कैसा ?प्यार के ठहराव जैसा ! ये बारिश है ? या इश्क के बाद का अहसास !जो आस्मां रोता है।

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